
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी
हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों के अनुभवों से जो मुहावरे और कहावतें बनाईं, वे प्रकृति के नियमों के मूलभूत सूत्र ही हैं। इनमें जो कहावत सर्वाधिक रूप से प्रासंगिक देखी जाती हैं, वह हैं-‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।’ मां के अन्न से मां और संतान के शरीर बनते हैं। उसी अन्न से दोनों के मन बनते हैं। जैसा मन, वैसी इच्छाएं, वैसे ही कर्म। जैसे कर्म, वैसे फल।
पिता के पास बीज है। वह भी अन्न के माध्यम से ही शरीर में पहुंचता है। शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा सबके अपने-अपने अन्न हैं। सारे अन्न मिलकर मन का और बीज का निर्माण करते हैं। अन्न से ही रस-रक्त-मांस-मेदा-अस्थि-मज्जा और शुक्र बनते हैं। विद्या-अविद्या के भाव जीवात्मा के देव-असुर रूपों का निर्माण करते हैं।
बिहार में लालू यादव के परिवार के घटनाक्रम को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। लालू परिवार ने चारा तो नहीं खाया, किन्तु चारा घोटाले का अन्न खाया है। रावण जैसे राक्षस को भी अपनी बहन (शूर्पणखा) का अपमान सहन नहीं हुआ था। इधर तेजस्वी, रोहिणी को गंदी गालियां दे रहे हैं। ऊपर से लालू कह रहे हैं कि ये तो परिवार के भीतर का मामला है। लालू यादव का यह अहंकार और चुनाव परिणाम दोनों इसी अन्न का परिणाम है।
क्या बिहार लालू-राबड़ी राज के दंश भूल पाएगा? अनगिनत और निर्मम। देश का पूरा मीडिया लालू-महिमा में व्यस्त था। आज भी यह खुमारी इस परिवार की शैली में बनी हुई है। पार्टी की हार से बड़ा परिवार का कलह नहीं है। परिवारों का सुख-दु:ख तो संस्कारों से जुड़ा होता है, जिसका श्रेय मां को ही जाता है।
भ्रष्टाचार का अन्न परिवार को ध्वस्त करता ही है। सम्पूर्ण इतिहास इसका गवाह है। आप किसी भी भ्रष्ट अफसर, नेता, उद्योगपति या अन्य को देख लें। असमय मृत्यु, रोग और कलह ही इन घरों में ईश्वर की कृपा का फल होते हैं। जेल और घर में अन्तर नहीं रह जाता। सार्वजनिक अपमान छूता तक नहीं-मन को। तब इस धन ने क्या सुख दिया?
धन लोलुपता, स्वार्थ एवं प्रजा को आहत करके अहंकार की तुष्टि करने वाला जब सार्वजनिक जीवन का नेतृत्व करता है तब सम्पूर्ण प्रजा का और देश का अहित ही होता है। उत्तरप्रदेश और बिहार में जिस स्तर के अत्याचार हुए हैं, वे अपनी गहरी छाप छोड़ गए। जैसे रोहिणी, लालू को नया जीवन देकर भी उसका घर छोड़ गई। जिस व्यक्ति का यश उसकी संतान के काम नहीं आए, वह जीवन अर्थहीन है। लालू, मीसा के लिए वोट मांगने गए थे, टोपी उतारकर। रोहिणी उनको प्यारी नहीं लगी। तेज प्रताप को निकाला। तेजस्वी हिसाब करेगा, यह तय है।
राजद का टूटना, कांग्रेस का टूटना देश के लोकतंत्र के लिए बड़े संकेत हैं। अधिकांश प्रान्तीय दल इस एक ही पटरी पर चल रहे हैं। सबका एक-एक करके टूटना तय है।
वे लोकतंत्र को छोड़ चले। आने वाले समय में लोकतंत्र (जनता के द्वारा) उनको भी छोड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। नई पीढ़ी व्यक्तिपरक लोकतंत्र तथा वंशवाद/जातिवाद आधारित राजनीति का साथ नहीं देगी, यह तय है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान तो देश के लोकतंत्र को होगा। क्षत्रप आते-जाते रहते हैं। काल न्याय कर देगा। कांग्रेस की गिरावट रोके नहीं रुक रही। यह राष्ट्रीय स्तर की विपक्षी पार्टी है। शनै:-शनै: अपना वजूद खोती जा रही है। उसके बाद भी राजद जैसी डूबती नाव में जा बैठती है। कौन चिन्तन करता है! नारे लगाने के बजाय देश के प्रति गंभीर चिन्तन करने का समय है। युवा पीढ़ी की अपेक्षाओं पर खरा उतरना पड़ेगा। सत्ता को कोसने से काम नहीं चलेगा। लोकतंत्र को आज सबसे बड़ा खतरा कांग्रेस से है। इसके बिना लोकतंत्र भी डूब जाएगा।
प्रियंका-राहुल को अपने कर्म की दिशा जनता के साथ जोड़नी चाहिए। प्रत्येक नेता का आकलन, भूमिका, परिणाम, निष्ठा जनता के साथ कितनी है, इसे समझना होगा। आज कांग्रेस पेट भरने का साधन रह गई। राष्ट्रीय विकास के मुुद्दे चर्चा में ही नहीं हैं। सत्ता पक्ष की आलोचना से उनको वोट नहीं मिलेंगे। पिटे हुए, भ्रष्ट नेताओं को बाहर करना पड़ेगा। नए लोग लाने होंगे। कांग्रेस के हाथ में भी बहुत समय नहीं है। बिहार के परिणाम इसके प्रमाण हैं।
लालू भले ही रोहिणी प्रकरण को पारिवारिक कहें, किन्तु ऐसा है नहीं। वह चुनाव में एक राजनीतिक उम्मीदवार भी थीं। इसे पार्टी कलह भी मानें तो गलत नहीं होगा। उसके ट्वीट में संवेदना थी। अन्य सभी के वक्तव्य पथरीले थे। इन पर देश के पालन-रक्षण-विकास का भार छोड़ना जनता को मंजूर नहीं था। पार्टी नहीं रहे या रहे, चिन्ता का विषय नहीं है।
कांग्रेस के प्रशंसकों की संख्या का घटना रुकेगा नहीं। अंग्रेजीदां नेता पार्टी चला नहीं सकते। उनको नए सिरे से भारतीय बना पाना अब संभव भी नहीं है। दोनों बहन-भाई भी भारतीयता से अनभिज्ञ हैं। पदयात्रा विकल्प नहीं है। भारत जैसे देश के लिए 40-50 वर्ष आगे सोचने की क्षमतावान टीम आज कांग्रेस में नहीं है।
गीता में कहा है-
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय:।
प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता:।।(गीता 16/9)
मिथ्या ज्ञान का अवलम्बन करके जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि अपकार करने वाली है ऐसे क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं।
Published on:
19 Nov 2025 07:38 am
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