
आर.के. विजय, (लेखक बीमा कंपनी में वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं)
भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से ही सामाजिक अवसरों पर स्वर्णाभूषणों का विशिष्ट स्थान रहा है। वर्तमान दौर में सोने की तेजी से बढ़ी कीमतों ने बहुत बड़े वर्ग को गहनों पर खर्च करने से हतोत्साहित ही नहीं किया, बल्कि लगभग असमर्थ बना दिया है। इसी के चलते कुछ समाजों व कुछ क्षेत्रों में विवाह जैसे अवसरों पर सोने के गहनों के लेन-देन पर या तो रोक लगा दी गई है अथवा गहनों की नाम-मात्र की सीमा तय की गई है।
स्वर्णाभूषणों की बिक्री मूल्य के दो प्रमुख घटक हैं। पहला गहने में लगे सोने की कीमत तथा दूसरा गहनों के गढऩे में हुए खर्चे यानी 'मेकिंग-चार्जेज'। आमतौर पर मेकिंग चार्ज गहने में लगे सोने की कीमत (बिक्री के समय) के कुछ प्रतिशत के रूप में तय किया जाता है यानी सोने के भावों में उतार-चढ़ाव की स्थिति में मेकिंग चार्जेज भी बढ़ते-घटते रहते हैं। पिछले कुछ समय में न केवल सोने के बढ़ते दामों, बल्कि परिणाम स्वरूप अधिक मेकिंग चार्ज ने भी आभूषणों की कीमतों को अत्यधिक बढ़ाया है। सवाल यह है कि क्या स्वर्णाभूषणों के मेकिंग चार्ज वसूलने का यह आधार तर्कसंगत है? आभूषणों के मेकिंग चार्ज में कारीगरों के मेहनताने तथा अन्य खर्चों के अलावा इसमें एक भाग गढ़ाई में होने वाली सोने की छीजत का भी होता है। मेकिंग चार्ज का पहला घटक यानि अन्य खर्चे तय होते हैं तथा धातु की कीमतों के साथ घटते-बढ़ते नहीं हैं। इसलिए इनको क्रेता से सोने की कीमत के प्रतिशत के रूप में वसूलने का क्या औचित्य है?
मूल बहस, यदि कोई की जा सकती है तो वह है उत्पादन में हुई छीजत के बारे में। सोने की कीमत गहनों की बिक्री के समय के बाजार मूल्य के अनुसार ली जाती है, वह वाजिब है। लेकिन सोने की जो मात्रा उत्पादन के दौरान नष्ट हो गई है, यानी बिक्री के समय भौतिक रूप से उपलब्ध ही नहीं है, उसके पेटे भी बिक्री के समय की बाजार कीमत वसूल की जाती है। आभूषण कारोबारी शायद यह मानते है कि गहने बनाने में जितना सोना छीजता है, गहने की बिक्री के समय उसकी वसूली बाजार कीमत से करना उनका हक है। जबकि ऐसा करना पूर्णतया अतार्किक है, क्योंकि धातु का जो हिस्सा ग्राहक के सुपुर्द किया ही नहीं जा रहा, उसका बिक्री के समय के भाव से क्रेता भुगतान क्यों करे? सोने की छीजत की मात्रा का मूल्य गहने के उत्पादन के समय के भाव से तय कर अन्य खर्चों में शामिल करते हुए मेकिंग चार्ज निश्चित करना अधिक तर्कसंगत है।
मेकिंग चार्ज निर्धारण की प्रचलित विधि के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि सोने की कीमतों के कम होने पर गहनों के क्रेता को लाभ होता है। लेकिन सोने के भावों का इतिहास गवाह है कि अधिकांश समय भाव बढऩे का क्रम ही जारी रहता है, जिससे खरीदारों को मेकिंग चार्ज निर्धारण की अनुचित पद्धति का खामियाजा उठाना पड़ता है। फिर सवाल यह भी है कि किसी भी पक्ष को अनुचित लाभ क्यों मिले? तटस्थ भाव से देखा जाए तो मेकिंग चार्ज सोने के भावों से जुड़ा न होकर तयशुदा (फिक्स्ड) होना चाहिए।
Updated on:
29 Nov 2025 03:26 pm
Published on:
29 Nov 2025 03:24 pm
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