
छत्तीसगढ़ के अनोखे गांव और उनके नामों की रोचक कहानियां, जिन्हें जानकर आप भी चौंक जाएंगे...(photo-patrika)
Chhattisgarh Unique Villages: जुलाई 1998 में जब अविभाजित मध्यप्रदेश का नक्शा बदला, तब 61वें जिले के रूप में महासमुंद का जन्म हुआ। बाद में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यह जिला नए स्वरूप में और मजबूत होकर उभरा। आज महासमुंद में पांच तहसील- महासमुंद, बागबाहरा, बसना, पिथौरा और सरायपाली- सक्रिय प्रशासनिक इकाइयों के रूप में मौजूद हैं।
जिले में 34 राजस्व निरीक्षक सर्किल, 1102 आबाद गांव और 35 विरान गांव शामिल हैं। लेकिन इन हजारों गांवों में कुछ ऐसे भी हैं जो अपने अनोखे और चौंकाने वाले नामों की वजह से सबसे अलग पहचान रखते हैं। ये नाम ही इन गांवों की कहानी हैं-,कहीं इतिहास की छाप है, कहीं अंग्रेजी शासन की याद, तो कहीं स्थानीय परंपराओं का असर।
जिले में पंचायतों के आश्रित सहित ऐसे कई विरान गांव हैं जिनके नाम को जानकर लोग सहसा रुक जाते हैं और दोबारा इसके नामकरण का कारण पूछते हैं, ऐसे नाम की वजह भी पूछ लेते हैं। इन्हीं में से एक गांव है पिथौरा ब्लॉक के ग्राम पंचायत मोहगांव के आश्रित गांव आरबी चिपमेन। जी हां, आरबी चिपमेन गांव का नाम सुनकर हर किसी को यह लगता है कि यह कैसा गांव है। गांव के प्रेरक रत्नाकर प्रधान बताते हैं कि गांव का नाम देश की आजादी के पूर्व से प्रचलित है।
गांव की आबादी छह सौ है। गांव का नाम सुनकर लोग इसे क्रिश्चन गांव होना सोचते हैं, जबकि एकमात्र क्रिश्चन परिवार गांव में है। गांव में सभी समाज के लोग रहते हैं। ग्रामीण चंद्रशेखर साहू का कहना है कि आजादी के पूर्व जमींदारों से अंग्रेजों की नहीं बनी तो जमींदार की जमीन का दो हिस्सा हुआ। एक का नाम पतेरापाली और दूसरे का नाम अंग्रेजी शासक रूबि बिलियम चिपमेन के नाम पर हो गया। तब से गांव को इस नाम से जाना जाता है।
पिथौरा ब्लॉक के आरंगी पंचायत का आश्रित गांव है नरसैरयापल्लम। गांव का नाम सुनकर लोगों को दक्षिण भारत के किसी गांव का आभास होता है। यहां 500 की आबादी है। 90 फीसद आदिवासी हैं। गांव के सरपंच श्यामलाल बहावल के पुन बंशी बताते हैं कि 1930 के पहले गांव का नाम तरसै्रयापल्लम था। तब इस गांव में लोग नहीं रहते, सुविधाएं नहीं थी।
जिस वजह से पूर्व के लोगों ने ऐसा नाम रखा। 1930 में तत्कालीन तहसीलदार ने गांव में आबादी देखकर नरसै्रयापल्ल्म कर दिया। बंशी कहते हैं कि पूर्व में नाम बदलने का विचार लोगों के मन में आया, लेकिन क्षेत्र में इस तरह का अकेला नाम होने की वजह से नहीं बदला गया।
बसना ब्लॉक के रंगमटिया पंचायत का आश्रित व विरान गांव है लोटाखालिया। रंगमटिया निवासी सुंदर सिंह बरिहा बताते हैं कि गांव विरान है इसीलिए इसका नाम लोटाखालिया है। पूर्व से यह विरान गांव इसी नाम से प्रचलन में है। बसना ब्लॉक के ग्राम पंचायत बिजराभांठा का आश्रित गांव है मिलाराबाद।
गांव का नाम सुनकर किसी मुस्लिम शासक के जरिए बसाया गांव लगता है, लेकिन ऐसा नहीं है। सरपंच संतलाल नायक का कहना है कि सरकारी रिकार्ड में मिलाराबाद गांव है, इसका नाम इसलिए ऐसा हुआ क्योंकि दो गांवों में झगड़ा हुआ, दोनों अलग हुए। कुछ समय बाद दोनों गांव मिल गए। तब इसका नाम मिलाराबाद हुआ।
जिले में सांई सरायपाली पंचायत में लावा महुआ, झांपी महुआ, बड़ेटमरी पंचायत में सरीफाबाद, बसना ब्लॉक में हेडसपाली, सरायपाली ब्लॉक में डुडुमचुंवा, प्रेतनडीह, बागविल विरान गांव, पंचायत घाटकछार में माकरमुता आदि गांव हैं, जिनका नाम सुनकर लोग दूसरी बार नाम पूछते हैं।
साल 1998 में अविभाजित मध्यप्रदेश का 61वां जिला बने महासमुंद में आज 1102 आबाद गांव और 35 विरान गांव हैं। लेकिन इन गांवों में कुछ ऐसे भी हैं, जिनके नाम सुनकर लोग चौंक जाते हैं—किसी के नाम में अंग्रेजी झलकती है, कहीं दक्षिण भारतीय प्रभाव दिखता है और कहीं नाम खुद ही गांव का इतिहास बयान कर देता है। आज हम आपको ले चलते हैं ऐसे ही कुछ दिलचस्प गांवों की कहानी में- जिन्हें सिर्फ देखा ही नहीं, समझा भी जाना चाहिए।
पिथौरा ब्लॉक के मोहगांव पंचायत का आश्रित गांव ‘आरबी चिपमेन’… नाम सुनकर लगता है जैसे किसी विदेशी बस्ती में आ गए हों। स्थानीय निवासी रत्नाकर प्रधान बताते हैं। गांव का ये नाम आजादी से पहले से चला आ रहा है। यहां के जमींदारों का एक अंग्रेज अफसर रूबि विलियम चिपमेन से विवाद हो गया था। बाद में जमीन दो हिस्सों में बटी-एक पतेरापाली और दूसरा ‘आरबी चिपमेन’। 600 आबादी वाले इस गांव में लोग इसे क्रिश्चन बहुल इलाका मान लेते हैं, जबकि गाँव में सिर्फ एक ही क्रिश्चन परिवार है।
पिथौरा ब्लॉक के आरंगी पंचायत का यह छोटा सा आदिवासी गांव नरसैरयापल्लम, नाम पढ़ते ही लगता है—मानो तमिलनाडु या आंध्रप्रदेश का कोई इलाका हो। गांव में 500 की आबादी, जिनमें 90% आदिवासी। सरपंच श्यामलाल बहावल के चाचा बंशी बताते हैं- 1930 से पहले गांव का नाम ‘तरसैरयापल्लम’ था। लोग कम रहते थे, सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए ऐसा नाम पड़ा। बाद में तहसीलदार ने नाम थोड़ा बदला और तब से यही नाम चल रहा है।
बसना ब्लॉक के रंगमटिया पंचायत का आश्रित गांव लोटाखालिया आज भी विरान है। स्थानीय निवासी सुंदर सिंह बरिहा कहते हैं- जब से गांव है, विरान है। लोग नहीं बस पाए… इसलिए नाम लोटाखालिया ही पड़ गया। नाम कहता है, यहां कोई ठहर नहीं पाया।
Published on:
30 Nov 2025 02:21 pm
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