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Premanand ji Maharaj : क्या सफलता सिर्फ मेहनत से मिलती है या किस्मत का भी हाथ होता है? प्रेमानंद महाराज ने बताया..

Premanand ji Maharaj : प्रेमानंद महाराज ने बताया कि धन और सफलता के लिए पुरुषार्थ (मेहनत) और प्रारब्ध (किस्मत) दोनों जरूरी हैं, पर प्रधानता भाग्य की होती है।

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Premanand ji Maharaj

Premanand ji Maharaj : धन और सफलता का रहस्य: प्रेमानंद महाराज बोले – किस्मत और पुरुषार्थ दोनों जरूरी हैं (फोटो सोर्स: Bhajan Marg)

Premanand ji Maharaj : क्या सफलता केवल मेहनत से मिलती है या इसमें किस्मत का भी योगदान होता है? यह सवाल हर इंसान के मन में उठता है। पंजाब के श्रीवांश ने जब यही प्रश्न प्रेमानंद महाराज से पूछा महाराज जी धन और सफलता मेहनत से मिलती है या किस्मत से अगर किस्मत से मिलती है तो लोग मेहनत क्यों करते हैं? महाराज जी ने कहा, धन और सफलता प्रारब्ध और पुरुषार्थ से मिलकर मिलती है। महाराज जी के अनुसार, मेहनत और भाग्य दोनों जीवन के रथ के दो पहिए हैं जिसे आप कह रहे हो मेहनत उसे कहते हैं पुरुषार्थ और जिसे आप कह रहे हो किस्मत उसे कहते हैं प्रारब्ध। जैसे एक बहुत पढ़ा लिखा अच्छा ग्रेजुएट डिग्री लिए घूम रहा है। नौकरी नहीं मिल रही। अभी उसकी किस्मत है कि उसने बहुत प्रयास किया। सफलता प्राप्त की, अंक प्राप्त किए। वह ग्रेजुएट भी है। कितने हैं जिन्होंने बहुत बड़ी मेहनत की और सफलता उनके हाथ नहीं लगी। वो कई जगह प्रयास किए। कई जगह सफल होते हुए भी विफल हो गए। यह किसका खेल है? किस्मत का या प्रारब्ध का।

महाराज जी ने कहा , एक आदमी है कि ज्यादा प्रयास नहीं करता और धन उसका बढ़ता चला जाता है। वो कार में घूमता है। सब व्यवस्था बढ़िया चल रही है ज्यादा माइंडेड नहीं है। ज्यादा प्रयास भी नहीं किया लेकिन सफल होता चला जाता है। उसका कारण है उसका प्रारब्ध। उसकी किस्मत। तो हमारा प्रयास और किस्मत दोनों मिल जाए तो सफलता अवश्य मिल जाती है।

प्रेमानंद महाराज ने कहा, अगर प्रयास है और हमारे भाग्य में नहीं है तो निष्फल ही रहोगे कितना भी प्रयास कर लो और भाग्य में है तो थोड़े प्रयास से भी बहुत बड़ा लाभ प्राप्त हो जाता है। हमने कितने को ऐसे देखा है कि बहुत बुद्धि है लेकिन खाने की व्यवस्था एकत्रित नहीं कर पा रहे हैं। बहुत पढ़े लिखे हैं हर चीज जानते हैं लेकिन उनके भाग्य में नहीं है तो प्रधानता दोनों की है प्रारब्ध और पुरुषार्थ की ।

प्रेमानंद महाराज ने कहा, अगर हम पुरुषार्थ कर रहे हैं तो एक बार प्रारब्ध असफल कर देगा, दो बार कर देगा, तीन बार कर देगा लेकिन हमको सफलता मिलेगी। पर है प्रारब्ध के अधीनरी। अगर प्रारब्ध नहीं है तो फिर नहीं मिलेगा। चाहे जितना आप व्यापार कर लो, चाहे जितना प्रयास कर लो वो सब चौपट हो जाएगा। क्योंकि भाग्य आपका साथ नहीं दे रहा। किस्मत आपके साथ नहीं दे रही तो दोनों काम करते हैं। उसमें पुरुषार्थ भी और प्रारब्ध भी प्रधानता प्रारब्ध की होती है।

सफलता, भाग्य और पुरुषार्थ : प्रेमानंद जी महाराज

  • सफलता भाग्य और पुरुषार्थ दोनों पर निर्भर करती है।
  • ईश्वरीय नाम जप हृदय को शुद्ध करने और मोक्ष प्राप्ति के लिए सर्वोच्च साधना है।
  • निर्गुण (निराकार) और सगुण (आकृति सहित) दोनों ही उपासनाएं ईश्वर की एक ही परम प्राप्ति की ओर ले जाती हैं।
  • अहंकार और घृणा जैसे आंतरिक दोष सच्ची भक्ति और सत्संग से विलीन हो जाते हैं।
  • मूर्तियों के भौतिक रूप अनित्य हैं; भक्ति और विश्वास औपचारिकता से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
  • चुने हुए देवता और गुरु के प्रति दृढ़ विश्वास और समर्पण आध्यात्मिक प्रगति को सुदृढ़ करते हैं।
  • प्रेम और निरंतर जप से प्रेरित भक्ति आध्यात्मिक आनंद और सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाती है।