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संपादकीय :मतदाता सूचियों में शुचिता से लोकतंत्र की मजबूती

मतदाता सूची में गड़बड़ी, फर्जी नाम, दोहरे पंजीकरण या मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम बने रहें, तो इसका सीधा असर चुनाव की विश्वसनीयता पर पड़ता है।

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मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण अभियान (एसआइआर) को लेकर विपक्ष की ओर से उठाई जा रही आपत्तियों के बीच निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए बुलाया है। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्र्जी एसआइआर को लेकर केंद्र सरकार व निर्वाचन आयोग पर लगातार हमले कर रही हैं। प. बंगाल व राजस्थान समेत ९ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में एसआइआर प्रक्रिया के निर्देश हैं। पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान कई राज्यों में बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की मौतों व प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को विपक्ष ने मुद्दा बना रखा है। विपक्ष का आरोप है कि काम के अत्यधिक दबाव से बीएलओ जान गंवा रहे हैं। हालांकि यह अभी तय कहा नहीं जा सकता कि ये मौतें सचमुच एसआइआर में काम के दबाव का नतीजा हैं या फिर इसके पीछे अन्य परिस्थितियां भी हैं।वस्तुत: चुनाव को लोकतंत्र का उत्सव तभी बनाया जा सकता है जब समूची चुनाव प्रक्रिया पारदर्शितापूर्ण हो। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब हर पात्र नागरिक के मतदान का अधिकार सुनिश्चित हो। इनमें मतदाता सूचियों के त्रुटिरहित होने का सबसे बड़ा योगदान है। बीएलओ की मेहनत से ही मतदाता सूचियां अपडेट होती हैं।

घर-घर जाकर दस्तावेज सत्यापित करना और समयबद्ध तरीके से रिपोर्ट तैयार करना साधारण कार्य नहीं है। यह सच है कि प्रशासनिक मशीनरी पर जब भी बड़े पैमाने का दायित्व आता है, तो कार्य दबाव भी बढ़ता है। ऐसे में बीएलओ की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-परिस्थितियों को प्राथमिकता देना राज्य सरकारों और चुनाव आयोग दोनों की जिम्मेदारी है। हालांकि, यह भी उतना ही जरूरी है कि मतदाता सूची का शुद्धीकरण किसी राजनीति का शिकार न बने।

मतदाता सूची में गड़बड़ी, फर्जी नाम, दोहरे पंजीकरण या मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम बने रहें, तो इसका सीधा असर चुनाव की विश्वसनीयता पर पड़ता है। ऐसे में विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, किसी को इस प्रक्रिया पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि मतदाता सूची को वैज्ञानिक, सटीक व पारदर्शी तरीके से अपडेट रखा जाए। इसके साथ ही चुनाव आयोग को यह भी समझना होगा कि एसआइआर जितना तकनीकी और संवेदनशील है, उतना ही पारदर्शिता का विषय भी है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन प्रक्रिया में अस्पष्टता से विवाद और अविश्वास बढऩा स्वाभाविक है। आयोग को इस प्रक्रिया को डेटा-संरक्षण, डिजिटल ट्रैकिंग और जमीनी सत्यापन के संतुलित मॉडल पर चलाना चाहिए। बीएलओ को पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण व सुरक्षा भी उपलब्ध करानी होगी।
यह भी याद रखना चाहिए कि अनावश्यक राजनीतिक दबाव से चीजें बिगड़ती है। ऐसे में एसआइआर जारी रखते हुए ऐसा माहौल बनाया जाए ताकि सभी कार्य निरपेक्ष ढंग से पूरे किए जा सकें। एसआइआर राजनीतिक मुद्दे से अलग लोकतंत्र की सेहत के विषय से जुड़़ा मानना होगा।