
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने युवती से रेप करने के आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
High Court: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में बलात्कार के एक आरोपी की बरी होने के निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष की गवाही में गंभीर खामियां और विरोधाभास थे, वहीं बचाव पक्ष ने झूठे आरोप की संभावना को मजबूती से प्रस्तुत किया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। यह मामला बठिंडा के जेएस विशेष न्यायालय के आदेश से जुड़ा था, जिसमें आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दर्ज आरोपों से बरी कर दिया गया था। पीड़िता ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपीलकर्ता के वकील का कहना था कि निचली अदालत ने पीड़िता की सुसंगत गवाही और दस्तावेजी साक्ष्यों को अनदेखा कर दिया, जिसके चलते आरोपी को अनुचित तरीके से राहत मिल गई।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति मंजरी नेहरू कौल और न्यायमूर्ति एचएस ग्रेवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की गवाही यदि भरोसेमंद हो तो अपने आप में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त होती है। लेकिन जब गवाही में विसंगतियां, परिस्थितियों को लेकर असमंजस और अन्य साक्ष्यों से विरोधाभास हो तब अदालत को सावधानी से निर्णय लेना होता है।
पीड़िता ने आरोप लगाया था कि एक आरोपी ने 07 मई 2017 को बलात्कार किया था और उससे पहले भी आरोपी ने लगभग एक महीने पहले उसका शोषण किया था। लेकिन अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयानों में तारीख, परिस्थितियों और उपस्थित व्यक्तियों को लेकर कई असंगतियां थीं। ये विरोधाभास केवल मामूली नहीं थे, बल्कि पूरे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते थे।
बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह भी रखा कि आरोपी और पीड़िता के बीच पहले से विवाद और दुश्मनी रही है। इस संबंध में गवाहों और दस्तावेजी रिकॉर्ड जैसे ड्यूटी रोस्टर पेश किए गए, जिन्हें अभियोजन पक्ष खारिज नहीं कर सका। अदालत ने माना कि इन परिस्थितियों से झूठे आरोप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि पीड़िता की चिकित्सीय जांच में कोई ऐसा सबूत सामने नहीं आया जो आरोपी को अपराध से जोड़ता हो। केवल योनि स्वैब में शुक्राणुओं की उपस्थिति भर से यह साबित नहीं होता कि अपराध उसी व्यक्ति ने किया है।
न्यायमूर्ति कौल ने कहा "योनि के स्वैब में शुक्राणुओं की उपस्थिति यह बता सकती है कि पीड़िता के साथ उसी समय और तारीख के आसपास संभोग हुआ था, लेकिन इससे अपराधी की पहचान नहीं हो पाती।" अदालत ने इस पर भी सवाल उठाया कि कथित घटना के एक महीने तक पीड़िता ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई और चुप रही, जिससे आरोप की गंभीरता और विश्वसनीयता पर और संदेह उत्पन्न हुआ।
अदालत ने यह भी इंगित किया कि जिस क्वार्टर में घटना होने का दावा किया गया, वहां आसपास कई लोग रहते थे। इसके बावजूद किसी भी स्वतंत्र गवाह से पूछताछ नहीं की गई और न ही किसी समकालीन शिकायत का कोई प्रमाण प्रस्तुत किया गया। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक चुप्पी साधे रहने से आरोपों की सच्चाई संदिग्ध हो जाती है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने अपील को खारिज कर दिया और निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।
एफआईआर के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि 7 मई 2017 को आरोपी ने उसके साथ जबरन दुष्कर्म किया। इससे पहले भी लगभग एक माह पहले आरोपी ने रेलवे क्वार्टर में उसके साथ इसी तरह की हरकत की थी। पीड़िता ने कहा था कि आरोपी ने उसे धमकाकर चुप रहने को मजबूर किया और डर के कारण वह घटना का खुलासा नहीं कर सकी। दूसरी घटना के बाद उसने साहस जुटाकर मामला दर्ज कराया।
Published on:
25 Sept 2025 03:49 pm
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